Thursday, 9 April 2015

आर्य समाज के नियम
1 सब सत्य विद्या और  जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं
  उन सबका आदि मूल परमेश्वर है |
2 ईश्वर सच्चिदानंदस्वरुप , निराकार , सर्वशक्तिमान,
  न्यायकारी, दयालु , अजन्मा , अनन्त , निर्विकार ,
  अनादि , अनुपम , सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक ,
  सर्वान्तर्यामी , अजर , अमर , अभय , नित्य , पवित्र
 और सृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करने योग्य है |
 3 वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक | वेद का पढना-
  पढाना और सुनना – सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है|
 4 सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोडने में सर्वदा
   उद्यत रहना चाहिये |
 5 सब काम धर्मानुसार अर्थात सत्य और असत्य को विचार
   करके करना चाहिये |
 6 संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है –
   अर्थात शारीरिक , आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना |
 7  सबसे प्रीतिपूर्वक धर्मानुसार यथायोग्य वर्तना चाहिये |
 8 अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये |
 9  प्रत्येक को  अपनी ही उन्नति में संतुष्ट नहीं रहना चाहिये,
    किन्तु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये |
10 सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में
   परतन्त्र रहना चाहिये और प्रत्येक हितकारी नियम में सब

    स्वतन्त्र रहें |

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